अटलजी की टेलीकॉम पॉलिसी-जानिये क्या थी ख़ास बात


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अटलजी की टेलीकॉम पॉलिसी में क्या थी खास बात?
- 1994 में देश में नई टेलीकॉम पॉलिसी आई, उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी और पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। इस पॉलिसी के आने के वक्त टेलीकॉम सेक्टर की ग्रोथ 1.2% थी, जो 1999 में बढ़कर 2.3% हो गई। हालांकि पहली बार 31 जुलाई 1995 में मोबाइल फोन पर बात हुई थी, लेकिन उससे पहले ही देश में संचार क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी। 1999 में अटल सरकार नई टेलीकॉम पॉलिसी लेकर आई, जिसमें लाइसेंस फीस को हटाकर रेवेन्यू शेयरिंग की व्यवस्था की गई।

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1 मिनट फोन पर बात करने के लिए लगते थे 16.80 रुपए :दरअसल, पहले टेलीकॉम ऑपरेटर्स को नेटवर्क का इस्तेमाल करने के लिए हर साल लाइसेंस खरीदना होता था, जो काफी महंगा होता था। रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपरेटर्स को हर ग्राहक पर 6,023 रुपए सरकार को सालाना देने होते थे। इस पैसे को कंपनियां अपने ग्राहकों से वसूलती थी, जिसकी वजह से कॉल रेट्स काफी महंगे होते थे और 1 मिनट फोन पर बात करने के लिए 16.80 रुपए चुकाने होते थे। 
- लेकिन अटल सरकार ने इस लाइसेंस फीस को खत्म किया और रेवेन्यू शेयरिंग की व्यवस्था की। दरअसल, 1999 में 22 टेलीकॉम ऑपरेटर्स ने एक रिपोर्ट में बताया कि उन्हें 7,700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ थी। जिसके बाद वाजपेयी सरकार में रेवेन्यू शेयरिंग की व्यवस्था हुई। इस नई व्यवस्था के बाद कंपनियों को अपने सालाना रेवेन्यू का 15% सरकार को देना होता था। इससे टेलीकॉम कंपनियों को फायदा हुआ, क्योंकि लाइसेंस फीस देना रेवेन्यू शेयरिंग के मुकाबले काफी महंगा हुआ करता था।
बीएसएन का गठन भी इसी सरकार ने किया : अटल सरकार में ही 15 सितंबर 2000 को भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) का गठन किया। इसके अलावा टेलीकॉम सेक्टर में होने वाले विवादों को सुलझाने के लिए 29 मई 2000 को टेलीकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट अपीलेट ट्रिब्यूनल (TDSAT) को भी गठन किया।
इससे ग्राहकों और कंपनियों को क्या फायदा हुआ?
- रेवेन्यू शेयरिंग की व्यवस्था आने के बाद न सिर्फ ग्राहकों को बल्कि कंपनियों को भी फायदा हुआ। इस व्यवस्था के बाद कंपनियों को अपने सालाना रेवेन्यू में से कुछ हिस्सा सरकार को देना होता था, जिससे कॉल रेट्स कम किए गए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करें। इसके कारण ग्राहकों को कम कीमत में वॉयस कॉलिंग की सुविधा मिलने लगी। हालांकि उस समय इंटरनेट नहीं था, जिस वजह से ग्राहकों को सिर्फ वॉयस कॉलिंग के पैसे ही देने पड़ते थे।

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